श्री लालबहादुर शास्त्री जीवनी
'जय जवान और जय किसान' का जयघोष करने वाले लाल बहादुर शास्त्री वास्तव में भारत के युगपुरुष थे । सन1964 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के देहावसान के उपरांत देश का दूसरा प्रधानमंत्री बनने का गौरव लाल बहादुर शास्त्री जी को प्राप्त हुआ था । उन्होंने 9 जून 1964 से 11 जनवरी 1966 तक इस पद पर रहे और विदेश मंत्री, गृह मंत्रालय और रेलवे के रूप में भी कार्य किया था । लाल बहादुर शास्त्री जी का जन्म 2 अक्टूबर सन् 1904 को वाराणसी के निकट मुगलसराय में हुआ था उनके पिता श्री शारदा प्रसाद श्रीवास्तव एक साधरण अध्यापक थे ...अपने डेढ़ वर्ष में ही वे अपने पिता को खो चुके थे उनका ललन पालन उनकी माता श्रीमति रामदुलारी ने किया था ।
शास्त्री जी को 'नन्हे' कहर पुकार जाता था। बड़ा होकर यह नन्ना बालक बहुत वीर निकला। एक छोटे से गरीब घर में जन्म लेकर भी यह बालक अपनी सच्चाई लगन और परिश्रम से देश के सर्वोच्च पद पर पहुचा था बचपन में इनकी माता श्रीमति रामदुलारी देवी इन्हें 'रामायण ' और 'महाभारत' की कथाएं शास्त्री जी को सुनाया करती थी। उन कहानियों का गहरा प्रभाव लाल बहादुर के मन पर पड़ा था और वह निर्भीक निडर और साहसी होते चले गए थे ।
लाल बहादुर जी के जीवन का एक महत्त्व पूर्ण 'घटना' है जो इनके बचपन में घटी थी जब वह दो माह के थे , तब एक बार गंगा नदी पार करते समय अपनी माँ की गोद से फिसल कर गंगा की तेज धारा में गिर पड़े ,तब इनकी माता बहुत रोई थी ....सब ने समझ लिया था कि नन्ना गंगा की भेंट चढ़ गया परंतु जिसे बचने वाला परमात्मा होता है उसे कौन मार सकता है । वास्तव में नन्हा माँ की गोद से छटक्कर ,पास में चल रही एक अन्य नौका में बैठे हुए एक किसान की टोकरी में जा गिरा था। किसान पहले तो नन्हे को अपने घर पर ले आया पर बुरे में इस्तेमाल दया आई और उसे काफी धुंधने के बुरा नन्हे को उसके मन पिता को वापस दे दिया... बेचारी माँ के तो आनंद की कोई सीमा नहीं रही थी।कुछ बड़ा होने पर यही नन्हा गंगा को तैर कर पार कर लिया करता था छठी कक्षा तक लाल बहादुर शास्त्री जी मुगलसराय में अपने नाना श्री हजारी लाल के पास रहकर पढ़े। बाद में वाराणसी के हरिश्चंद्र हाई स्कूल में पढ़ने आ गए वहां अपने मौसा जी श्री रघुनाथ प्रसाद जी के यहां रहते थे । इनके मौसा के आदर्श परिवार का इन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा.... यहां उन्होंने सीखा की आदमी को अपना काम सदैव बिना फल की कामना किए करना चाहिए और सदैव सदा जीवन व्यतित करना चाहिए।
वाराणसी में रहते हुए लाल बहादुर शास्त्री ने लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी आदि महापुरुषों के दर्शन किए और उनकी ओजस्वी वाणी को सुना उनकी पुकार प्रति 16 वर्ष की आयु में लाल बहादुर शास्त्री जी सहयोग आंदोलन में कूद पड़े, गांधी जी के संपर्क मे उन्होंने सीखा कि जो लोग दूसरों के दुख दर्द को जानने के लिए अपने दुख को भूल जाते हैं ...वे सारी दुनिया के प्यारे होते हैं , शास्त्री जी की पत्नी श्रीमती ललिता देवी ने सदा उनका साथ दिया। Ji
लाल बहादुर शास्त्री जी का अधिकार समय उत्तर प्रदेश में व्यातीत हुआ ही सन '1930 से सन 1945' तक स्वाधीनता आंदोलन से जुडकर देश की विभिन जेलों में रहे शास्त्री जी ने सारे कष्ट को एक तपस्वी की तरह सहन किया इन कष्ट के बीच उनकी पत्नी ललिता देवी भी पूरी तरह अडिग रही ।
नेहरू जी के बाद जब शास्त्री जी स्वाधीन भारत के द्वितीय प्रधान मंत्री बने तब पडोसी देश पाकिस्तान ने भारत पर इसीलिये आक्रमण कर दिया, कि वह शास्त्री जी को एक कमजोर प्रधान मंत्री समझता था... परंतु शास्त्री जी की एक दहाड़ ने दुश्मनों को हिलाकर रख दिया भारतीय फौज और देश की किसानों ने जब शास्त्री जी के मुख से' जय जवान जय किसान 'का नारा सुना तो पूरा देश जैसा उठ खड़ा हुआ शास्त्री जी की एक हुंकार से ही पूरी दुनिया दहल उठी।
दुश्मन के दांत खट्टे करने के बाद रूस के प्रधानमंत्री के निमंत्रण पर शास्त्री जी शांति की खोज में ताशकंद गए वहां उन्हें पाकिस्तान के राष्ट्रपति से भेट की ,परंतू 11 जनवरी, 1966 को ताशकंद में ही भारत का यह बहादुर प्रधानमंत्री हमेशा के लिए भारत वासियो से दूर चला गया । दिल्ली में यमुना के किनारे 'विजय घाट 'पर शास्त्री जी का अंतिम संस्कार कर दिया गया था ।किंतु शांति और वीरता का वह असाधरण सैनिक आज भी भारतवासियों के हृदय में बसा हुआ है ।
श्री लाल बहादुर शास्त्री जी की जीवनी आपको कैसी लगी आशा करती हूं कि आपको यह Post अच्छी लगी होगी तो कमेंट करके जरूर बताएं 🙏🙏
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
Pls do not enter any spam link in the comment box